11Labour Economics
1. डोरिंगर और पियोरे (Doeringer & Piore) – 1971
परिचय: पीटर डोरिंगर (Peter Doeringer) – अमेरिकी अर्थशास्त्री, बोस्टन विश्वविद्यालय; माइकल पियोरे (Michael Piore) – अमेरिकी अर्थशास्त्री, MIT। दोहरा श्रम बाजार सिद्धांत (Dual Labour Market Theory – DLMT) के प्रतिपादक।
सिद्धांत: दोहरा श्रम बाजार सिद्धांत (Dual Labour Market Theory) – श्रम बाजार दो खंडों (segments) में विभाजित होता है: प्राथमिक (Primary) और द्वितीयक (Secondary)।
पुस्तक: "Internal Labor Markets and Manpower Analysis" (1971)।
वर्ष: 1971।
मुख्य मान्यताएँ (Assumptions):
1. श्रम बाजार एक समान (homogeneous) नहीं है – यह दो अलग-अलग खंडों (segments) में विभाजित है जिनके बीच गतिशीलता (mobility) सीमित है।
2. प्राथमिक श्रम बाजार (Primary Labour Market):
· उच्च मजदूरी (high wages), नौकरी की सुरक्षा (job security), अच्छी कार्य स्थितियाँ (good working conditions), उन्नति के अवसर (promotion opportunities)।
· आंतरिक श्रम बाजार (internal labour market) – फर्मों के भीतर नियम और प्रक्रियाएँ (पदानुक्रम, वरिष्ठता नियम, आंतरिक प्रशिक्षण)।
· संस्थागत नियम (institutional rules) – संघ (unions), श्रम कानून (labour laws)।
3. द्वितीयक श्रम बाजार (Secondary Labour Market):
· कम मजदूरी (low wages), नौकरी की असुरक्षा (job insecurity), खराब कार्य स्थितियाँ (poor working conditions), उन्नति के अवसर नहीं (no promotion prospects)।
· बाहरी श्रम बाजार (external labour market) – प्रतिस्पर्धी, स्पॉट बाजार (spot market) जैसा।
· उच्च कारोबार (high turnover), अप्रशिक्षित श्रम (unskilled labour)।
4. प्राथमिक और द्वितीयक बाजारों के बीच गतिशीलता (mobility) बहुत सीमित है – द्वितीयक बाजार के श्रमिक बहुत कठिनाई से प्राथमिक बाजार में प्रवेश कर सकते हैं।
5. द्वितीयक बाजार मानव पूंजी (human capital) को बढ़ाने के अवसर प्रदान नहीं करता – इसलिए श्रमिक वहीं फँसे रहते हैं।
6. विभाजन (segmentation) का कारण संस्थागत कारक (institutional factors) हैं – नस्ल, लिंग, जाति, सामाजिक नेटवर्क, और ऐतिहासिक भेदभाव।
मुख्य निष्कर्ष (Conclusions):
1. दोहरे श्रम बाजार मॉडल (Dual Labour Market Model) की मुख्य विशेषताएँ:
विशेषता (Feature) प्राथमिक बाजार (Primary) द्वितीयक बाजार (Secondary)
मजदूरी (Wage) उच्च निम्न
नौकरी सुरक्षा (Job security) उच्च निम्न
उन्नति के अवसर (Promotion) हाँ (आंतरिक) नहीं (मृत-अंत – dead-end)
प्रशिक्षण (Training) ऑन-द-जॉब, फर्म-विशिष्ट बहुत कम या कोई नहीं
कार्य स्थितियाँ (Work conditions) अच्छी खराब
कारोबार दर (Turnover rate) निम्न उच्च
श्रमिक प्रकार (Worker type) कुशल, संगठित अकुशल, असंगठित
बाजार प्रकार (Market type) आंतरिक (internal) बाहरी (external / प्रतिस्पर्धी)
1. आंतरिक श्रम बाजार (Internal Labour Market – ILM): फर्मों के भीतर नियमों और प्रक्रियाओं का एक समूह जो श्रम का आवंटन (allocation) और मूल्य निर्धारण (pricing) करता है – यह विशुद्ध प्रतिस्पर्धी (pure competitive) बाजार से भिन्न होता है।
· ILM की विशेषताएँ: वरिष्ठता नियम (seniority rules), नौकरी लैडर (job ladders), आंतरिक प्रशिक्षण (internal training), आजीवन रोजगार (lifetime employment – जापानी प्रणाली)।
2. प्राथमिक बाजार का एकाधिकार (Monopoly) जैसा व्यवहार: प्राथमिक बाजार में संघ (unions) और संस्थागत सुरक्षा के कारण, मजदूरी प्रतिस्पर्धी स्तर (competitive level) से ऊपर होती है।
3. द्वितीयक बाजार प्रतिस्पर्धी (competitive) है: यहाँ मजदूरी पूर्ण प्रतिस्पर्धा के करीब होती है, लेकिन कार्य स्थितियाँ खराब होती हैं।
4. गतिशीलता की कमी (Lack of mobility) का कारण: द्वितीयक बाजार के श्रमिकों के पास प्राथमिक बाजार में प्रवेश के लिए आवश्यक कौशल (skills), कनेक्शन (connections), या संकेत (signals) नहीं होते। यहाँ तक कि यदि वे प्राथमिक बाजार में नौकरी प्राप्त कर लेते हैं, तो उन्हें भेदभाव (discrimination) का सामना करना पड़ सकता है।
5. नीति निहितार्थ (Policy implications):
· शिक्षा और प्रशिक्षण (education and training) अकेले पर्याप्त नहीं हैं – क्योंकि द्वितीयक बाजार प्रशिक्षण के अवसर प्रदान नहीं करता।
· प्राथमिक बाजार तक पहुँच के लिए सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) और संस्थागत सुधार (institutional reforms) की आवश्यकता है।
· न्यूनतम मजदूरी कानून (minimum wage laws) द्वितीयक बाजार में मदद कर सकते हैं, लेकिन वे प्राथमिक बाजार तक पहुँच की बाधा को नहीं हटाते।
आगे बढ़ाने वाले:
· गैरी बेकर (Becker) – मानव पूंजी सिद्धांत (Human Capital Theory): डोरिंगर और पियोरे ने बेकर के विचारों (शिक्षा और प्रशिक्षण से मजदूरी बढ़ती है) को चुनौती दी – दिखाया कि संस्थागत कारक भी महत्वपूर्ण हैं।
· लेस्टर थुरो (Thurow): "नौकरी प्रतिस्पर्धा मॉडल" (Job Competition Model) – श्रमिक नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, न कि मजदूरी के लिए।
· माइकल पियोरे (Piore) ने बाद में "दूसरा औद्योगिक विभाजन" (Second Industrial Divide) पर काम किया।
· डेविड गॉर्डन (Gordon), रिचर्ड एडवर्ड्स (Edwards), माइकल रीच (Reich): "विभाजित श्रम बाजार" (Segmented Labour Markets) पर विस्तृत कार्य।
आलोचना (Criticism):
· मानव पूंजी सिद्धांतकार (Human Capital theorists – Becker, Mincer): डोरिंगर-पियोरे शिक्षा और प्रशिक्षण के महत्व को कम करके आंकते हैं। बेकर का तर्क है कि मजदूरी में अंतर मुख्य रूप से कौशल (skills) और उत्पादकता (productivity) में अंतर के कारण होता है – संस्थागत कारक गौण हैं।
· नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्री (Neoclassical economists): दोहरा श्रम बाजार मॉडल "बाजार विफलता" (market failure) मानता है – लेकिन नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि यह विभाजन केवल अस्थायी (temporary) है। दीर्घकाल में, प्रतिस्पर्धा (competition) विभाजन को समाप्त कर देगी।
· अनुभवजन्य साक्ष्य (Empirical evidence) मिश्रित हैं: कुछ अध्ययनों ने दोहरे श्रम बाजार के अस्तित्व (existence) की पुष्टि की है, लेकिन अन्य ने प्राथमिक और द्वितीयक के बीच महत्वपूर्ण गतिशीलता (significant mobility) पाई है – विशेषकर युवा श्रमिकों (young workers) के लिए।
· द्वितीयक बाजार की परिभाषा (definition) अस्पष्ट है: कुछ नौकरियाँ द्वितीयक बाजार में क्यों हैं? क्या यह नौकरी की गुणवत्ता (job quality) है या श्रमिक की विशेषताएँ (worker characteristics)? डोरिंगर-पियोरे ने इसे पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया।
· वैश्वीकरण (Globalisation) का प्रभाव: डोरिंगर-पियोरे का मॉडल बंद अर्थव्यवस्था (closed economy) मानता है। वैश्वीकरण के युग में, प्राथमिक बाजार की नौकरियाँ विकासशील देशों (offshoring) में स्थानांतरित हो रही हैं – जिससे विकसित देशों में "प्राथमिक" बाजार सिकुड़ (shrink) रहा है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Points):
· PYQ (UGC-NET / राज्य सेवाएँ): "दोहरा श्रम बाजार सिद्धांत (Dual Labour Market Theory) के प्रतिपादक कौन हैं?" → डोरिंगर और पियोरे (Doeringer & Piore, 1971)।
· PYQ: "दोहरे श्रम बाजार के दो खंड (segments) कौन से हैं?" → प्राथमिक (Primary) और द्वितीयक (Secondary)।
· PYQ: "प्राथमिक श्रम बाजार की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?" → उच्च मजदूरी, नौकरी सुरक्षा, उन्नति के अवसर, आंतरिक प्रशिक्षण, कम कारोबार।
· ट्रिक: "Doeringer & Piore = D & P for 'Dual & Primary/secondary' – 'P' also for 'Piore's primary market'"।
· महत्वपूर्ण शब्द: दोहरा श्रम बाजार (Dual Labour Market), प्राथमिक बाजार (Primary market), द्वितीयक बाजार (Secondary market), आंतरिक श्रम बाजार (Internal Labour Market – ILM), गतिशीलता (mobility), श्रम बाजार विभाजन (labour market segmentation)।
Numerical Question (Conceptual):
प्रश्न: दो श्रमिक A और B हैं। A एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है – वेतन ₹1,50,000 प्रति माह, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, प्रशिक्षण कार्यक्रम, नियमित वेतन वृद्धि। B एक निर्माण स्थल पर दैनिक मजदूर है – वेतन ₹400 प्रति दिन (काम मिलने पर), कोई सुरक्षा नहीं, कोई प्रशिक्षण नहीं, कोई वेतन वृद्धि नहीं। डोरिंगर-पियोरे के दोहरे श्रम बाजार सिद्धांत के अनुसार, A और B किस बाजार में हैं?
हल:
· A: उच्च मजदूरी, नौकरी सुरक्षा, उन्नति, प्रशिक्षण ⇒ प्राथमिक बाजार (Primary market)।
· B: कम मजदूरी, असुरक्षा, कोई उन्नति नहीं, कोई प्रशिक्षण नहीं ⇒ द्वितीयक बाजार (Secondary market)।
· उत्तर: A प्राथमिक में, B द्वितीयक में – और इनके बीच गतिशीलता (mobility) बहुत कठिन है।
MCQ:
Q: डोरिंगर और पियोरे (Doeringer & Piore) के दोहरे श्रम बाजार सिद्धांत (Dual Labour Market Theory) के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन सी विशेषता द्वितीयक श्रम बाजार (Secondary Labour Market) की है?
· (a) उच्च मजदूरी (high wages)
· (b) नौकरी सुरक्षा (job security)
· (c) उच्च कारोबार (high turnover)
· (d) आंतरिक प्रशिक्षण (internal training)
उत्तर: (c) उच्च कारोबार (high turnover)
One-Line Revision:
· Doeringer & Piore: दोहरा श्रम बाजार सिद्धांत – प्राथमिक बाजार (उच्च मजदूरी, सुरक्षा, उन्नति) और द्वितीयक बाजार (निम्न मजदूरी, असुरक्षा, मृत-अंत); बीच में सीमित गतिशीलता; आंतरिक श्रम बाजार (ILM) प्राथमिक की विशेषता।
---
2. जोसेफ स्टिग्लिट्ज (Joseph Stiglitz) – 1980s
3. जेनेट येलेन (Janet Yellen) – 1980s
(दोनों को एक साथ – दक्षता मजदूरी सिद्धांत – Efficiency Wage Theory)
परिचय: जोसेफ स्टिग्लिट्ज (अमेरिकी अर्थशास्त्री, नोबेल 2001, कोलंबिया विश्वविद्यालय) और जेनेट येलेन (अमेरिकी अर्थशास्त्री, फेडरल रिजर्व की पूर्व अध्यक्ष, ट्रेजरी सचिव) – दंपति (married couple) ने मिलकर दक्षता मजदूरी (efficiency wage) पर कई महत्वपूर्ण पेपर लिखे।
सिद्धांत: दक्षता मजदूरी सिद्धांत (Efficiency Wage Theory) – फर्में प्रतिस्पर्धी स्तर से अधिक मजदूरी (above-market wage) क्यों देती हैं।
पुस्तकें / लेख:
· स्टिग्लिट्ज: "The Efficiency Wage Hypothesis, Surplus Labour, and the Distribution of Income in LDCs" – Oxford Economic Papers (1976 – प्रारंभिक) – बाद में 1980 के दशक में येलेन के साथ।
· येलेन: "Efficiency Wage Models of Unemployment" – American Economic Review (1984) – यह एक सर्वेक्षण (survey) लेख था।
· स्टिग्लिट्ज और येलेन: "Efficiency Wages and the Macroeconomic Cycle" (1980s)।
वर्ष: 1980s (मुख्य कार्य 1980-84)।
मुख्य मान्यताएँ (Assumptions):
1. श्रमिकों का प्रयास (effort) मजदूरी (wage) पर निर्भर करता है – उच्च मजदूरी से श्रमिक अधिक मेहनत करते हैं (या कम शिरकत – shirking – करते हैं)।
2. फर्में श्रमिकों के प्रयास (effort) को पूरी तरह से निःशुल्क (costlessly) नहीं माप सकतीं – निगरानी (monitoring) महंगी है या अधूरी है।
3. यदि एक फर्म प्रतिस्पर्धी (market-clearing) मजदूरी देती है, तो श्रमिकों के पास शिरकत (shirking) करने का प्रोत्साहन होता है – क्योंकि यदि उन्हें निकाल दिया जाता है, तो वे तुरंत समान मजदूरी पर दूसरी नौकरी पा सकते हैं।
4. यदि एक फर्म प्रतिस्पर्धी स्तर से अधिक मजदूरी (efficiency wage) देती है, तो:
· श्रमिक शिरकत (shirking) नहीं करेंगे – क्योंकि नौकरी खोने पर उन्हें "किराया" (rent) खोना पड़ता है।
· श्रमिकों का कारोबार (turnover) कम होता है।
· बेहतर श्रमिक (better workers) आकर्षित होते हैं (प्रतिकूल चयन – adverse selection – कम होता है)।
· श्रमिकों का मनोबल (morale) और वफादारी (loyalty) बढ़ती है।
5. फर्में एक ऐसी मजदूरी (w*) चुनती हैं जो प्रति मजदूरी लागत पर प्रयास (effort per wage cost) को अधिकतम करती है – यही दक्षता मजदूरी (efficiency wage) है।
मुख्य निष्कर्ष (Conclusions):
1. दक्षता मजदूरी (Efficiency Wage) के चार मुख्य मॉडल (चार कारण क्यों फर्में अधिक मजदूरी देती हैं):
मॉडल (Model) कारण (Reason) प्रमुख प्रतिपादक (Key proponent)
1. शिरकत मॉडल (Shirking Model) निगरानी (monitoring) महंगी है; उच्च मजदूरी शिरकत को हतोत्साहित (discourage) करती है। शापिरो (Shapiro) और स्टिग्लिट्ज (Stiglitz)
2. कारोबार मॉडल (Turnover Model) उच्च मजदूरी कारोबार (turnover) घटाती है – भर्ती (recruitment) और प्रशिक्षण (training) लागत बचाती है। स्टिग्लिट्ज, येलेन
3. प्रतिकूल चयन मॉडल (Adverse Selection Model) उच्च मजदूरी अधिक उत्पादक (more productive) श्रमिकों को आकर्षित करती है। वाइस (Weiss)
4. पोषण मॉडल (Nutrition Model) उच्च मजदूरी श्रमिकों को बेहतर पोषण (nutrition) की अनुमति देती है, जिससे उत्पादकता बढ़ती है। (विकासशील देशों में) लीबेनस्टीन (Leibenstein)
1. दक्षता मजदूरी शिरकत मॉडल (Shapiro-Stiglitz Model – 1984) का मुख्य परिणाम:
· बेरोजगारी (unemployment) एक अनुशासनात्मक उपकरण (disciplinary device) के रूप में कार्य करती है।
· समतुल्यता (equilibrium) में, प्रतिस्पर्धी मजदूरी से अधिक मजदूरी होती है, और अनैच्छिक बेरोजगारी (involuntary unemployment) उत्पन्न होती है – क्योंकि फर्में सभी श्रमिकों को काम पर रखना नहीं चाहतीं (यदि वे सभी को काम पर रख दें, तो शिरकत को दंडित करना कठिन हो जाता है)।
· मॉडल बताता है कि क्यों विकसित अर्थव्यवस्थाओं (developed economies) में शून्य बेरोजगारी (zero unemployment) नहीं होती – फर्में जानबूझकर (deliberately) प्रतिस्पर्धी मजदूरी से अधिक भुगतान करके और कुछ श्रमिकों को बेरोजगार रखकर, दूसरों को शिरकत से बचाती हैं।
2. दक्षता मजदूरी (efficiency wage) प्रतिस्पर्धी (market-clearing) मजदूरी से अधिक होती है: w_E > w^*
· यह न्यूनतम मजदूरी (minimum wage) की तरह व्यवहार कर सकती है – दक्षता मजदूरी बेरोजगारी पैदा कर सकती है।
3. बेरोजगारी के लिए निहितार्थ (Implications for unemployment):
· नव-शास्त्रीय मॉडल (neoclassical model): बेरोजगारी अस्थायी (temporary) या स्वैच्छिक (voluntary) है।
· दक्षता मजदूरी मॉडल: अनैच्छिक बेरोजगारी (involuntary unemployment) मौजूद हो सकती है – श्रमिक प्रतिस्पर्धी मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं, लेकिन फर्में उन्हें काम पर नहीं रखतीं।
4. स्टिग्लिट्ज और येलेन ने दिखाया: दक्षता मजदूरी व्यापार चक्र (business cycle) को भी प्रभावित कर सकती है – मंदी (recession) में, फर्में मजदूरी कम करने के बजाय श्रमिकों को निकाल (layoff) सकती हैं, क्योंकि मजदूरी कम करने से उत्पादकता अधिक घटेगी।
5. नीति निहितार्थ (Policy implications):
· न्यूनतम मजदूरी (minimum wage) बेरोजगारी बढ़ा सकती है (शास्त्रीय दृष्टिकोण), लेकिन दक्षता मजदूरी के संदर्भ में, न्यूनतम मजदूरी का प्रभाव अस्पष्ट (ambiguous) है।
· सरकारी हस्तक्षेप (government intervention) – जैसे नौकरी प्रशिक्षण (job training), रोजगार सब्सिडी (employment subsidies) – बेरोजगारी को कम कर सकते हैं।
आगे बढ़ाने वाले:
· कार्ल शापिरो (Carl Shapiro): स्टिग्लिट्ज के साथ शिरकत मॉडल (Shirking model) – "Equilibrium Unemployment as a Worker Discipline Device" (1984)।
· एंड्रयू वाइस (Andrew Weiss): प्रतिकूल चयन मॉडल (Adverse selection model) – दक्षता मजदूरी एक स्क्रीनिंग डिवाइस (screening device) के रूप में।
· हार्वे लीबेनस्टीन (Harvey Leibenstein): पोषण मॉडल (Nutrition model) – विकासशील देशों के लिए।
· जेरेमी बुलो (Bulow) और लॉरेंस समर्स (Summers): "A Theory of Dual Labour Markets with Efficiency Wages" (1986) – दक्षता मजदूरी और दोहरे श्रम बाजार का संश्लेषण।
आलोचना (Criticism):
· प्रयोगात्मक साक्ष्य (Experimental evidence) मिश्रित हैं: कुछ प्रयोग बताते हैं कि श्रमिक उच्च मजदूरी पर अधिक मेहनत करते हैं (गिफ्ट एक्सचेंज – gift exchange), लेकिन अन्य प्रयोग बताते हैं कि प्रभाव (effect) छोटा है या अस्थायी (temporary) है।
· अन्य स्पष्टीकरण (Alternative explanations): फर्में उच्च मजदूरी क्यों देती हैं? इसके अन्य स्पष्टीकरण हैं – संघ का दबाव (union pressure), सामाजिक मानदंड (social norms), न्याय की भावना (fairness) – दक्षता मजदूरी इन सभी को एक ही छतरी के नीचे रखने का प्रयास है।
· मापन की कठिनाई (Measurement difficulty): "प्रयास" (effort) को मापना बहुत कठिन है – इसलिए दक्षता मजदूरी मॉडल का अनुभवजन्य परीक्षण (empirical testing) कठिन है।
· दीर्घकालिक अनुबंध (Long-term contracts) को नजरअंदाज करता है: कई फर्में अपने श्रमिकों के साथ दीर्घकालिक संबंध (long-term relationships) बनाती हैं – इनमें शिरकत (shirking) को तत्काल दंडित नहीं किया जाता; दक्षता मजदूरी मॉडल अक्सर स्थिर (static) होता है।
· एजेंसी सिद्धांत (Agency theory) से तुलना: एजेंसी सिद्धांत (जैसे प्रोत्साहन अनुबंध – incentive contracts) प्रयास (effort) को प्रोत्साहित करने का एक और तरीका बताता है – लेकिन स्टिग्लिट्ज-येलेन मॉडल केवल मजदूरी पर ध्यान केंद्रित करता है, अनुबंध की संरचना (contract structure) पर नहीं।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Points):
· PYQ (UGC-NET / राज्य सेवाएँ): "दक्षता मजदूरी सिद्धांत (Efficiency Wage Theory) के प्रमुख प्रतिपादक कौन हैं?" → जोसेफ स्टिग्लिट्ज, जेनेट येलेन, कार्ल शापिरो, एंड्रयू वाइस (मुख्य रूप से स्टिग्लिट्ज-येलेन)।
· PYQ: "दक्षता मजदूरी (efficiency wage) प्रतिस्पर्धी मजदूरी (competitive wage) से कैसे भिन्न होती है?" → दक्षता मजदूरी > प्रतिस्पर्धी मजदूरी (यह शिरकत को रोकती है, उत्पादकता बढ़ाती है)।
· PYQ: "शापिरो-स्टिग्लिट्ज मॉडल (Shapiro-Stiglitz Model) में बेरोजगारी का क्या कार्य है?" → बेरोजगारी एक अनुशासनात्मक उपकरण (disciplinary device) है – यह श्रमिकों को शिरकत (shirking) से रोकती है।
· ट्रिक: "Stiglitz-Yellen = S & Y for 'Shapiro-Stiglitz (shirking) and Yellen (turnover/efficiency)' – 'E' for 'Efficiency wage > market wage'"।
· महत्वपूर्ण शब्द: दक्षता मजदूरी (Efficiency wage), शिरकत (shirking), अनैच्छिक बेरोजगारी (involuntary unemployment), कारोबार (turnover), प्रतिकूल चयन (adverse selection), पोषण मॉडल (nutrition model), शापिरो-स्टिग्लिट्ज मॉडल (Shapiro-Stiglitz model)।
Numerical Question (Conceptual – Efficiency Wage vs Market Wage):
प्रश्न: एक प्रतिस्पर्धी श्रम बाजार में, संतुलन मजदूरी (market wage) w* = ₹500 प्रति दिन है। एक फर्म प्रयास (effort) और उत्पादकता (productivity) के बीच संबंध E = 0.5 × w (जहाँ w दैनिक मजदूरी है, और E प्रयास सूचकांक 0-100 में) देखती है। फर्म की लाभ (profit) प्रति श्रमिक = (E × 100) – w (मान लें 100 उत्पादकता का आधार)। प्रतिस्पर्धी मजदूरी (w*=500) पर प्रयास (E) और लाभ क्या होगा? दक्षता मजदूरी (w_E) क्या होगी जो लाभ को अधिकतम (maximise) करती है?
हल:
1. w = 500 पर, E = 0.5 × 500 = 250? (यह 0.5×500=250 है – लेकिन प्रयास सूचकांक 0-100 में होना चाहिए – यहाँ सूत्र सरल रखा गया है, मान लें कि E का अधिकतम 100 है; तो 0.5×500=250 असंभव है। सही सूत्र मानें E = min(100, 0.5 × w) – तो 500 पर E = 100 (क्योंकि 0.5×500=250>100, इसलिए 100)।
लाभ प्रति श्रमिक = (100 × 100) – 500 = 10,000 – 500 = 9,500।
2. दक्षता मजदूरी (w_E) वह मजदूरी है जो प्रति श्रमिक लाभ को अधिकतम करती है। लाभ = (E × 100) – w। E = min(100, 0.5w)।
· यदि w ≤ 200, E = 0.5w (क्योंकि 0.5w ≤ 100) ⇒ लाभ = 50w – w = 49w (जो w के साथ बढ़ता है)।
· यदि w ≥ 200, E = 100 (अधिकतम) ⇒ लाभ = 10,000 – w (जो w के साथ घटता है)।
इसलिए अधिकतम लाभ w = 200 पर होता है (जहाँ E = 100 और लाभ = 10,000 – 200 = 9,800)।
3. प्रतिस्पर्धी मजदूरी (500) पर लाभ 9,500 है; दक्षता मजदूरी (200) पर लाभ 9,800 है (अधिक)।
4. उत्तर: प्रतिस्पर्धी मजदूरी पर लाभ = 9,500; दक्षता मजदूरी w_E = 200 पर लाभ = 9,800 (अधिकतम)।
MCQ:
Q: शापिरो-स्टिग्लिट्ज दक्षता मजदूरी मॉडल (Shapiro-Stiglitz Efficiency Wage Model) के अनुसार, अनैच्छिक बेरोजगारी (involuntary unemployment) का मुख्य कारण क्या है?
· (a) न्यूनतम मजदूरी कानून (minimum wage laws)
· (b) संघ (trade unions)
· (c) फर्मों द्वारा प्रतिस्पर्धी स्तर से अधिक मजदूरी (efficiency wage) का भुगतान
· (d) कुशल श्रमिकों (skilled workers) की कमी
उत्तर: (c) फर्मों द्वारा प्रतिस्पर्धी स्तर से अधिक मजदूरी (efficiency wage) का भुगतान
One-Line Revision:
· Stiglitz & Yellen: दक्षता मजदूरी सिद्धांत – फर्में प्रतिस्पर्धी मजदूरी से अधिक भुगतान करती हैं ताकि श्रमिक शिरकत (shirking) न करें, कारोबार (turnover) कम हो, और बेहतर श्रमिक आकर्षित हों; इससे अनैच्छिक बेरोजगारी (involuntary unemployment) उत्पन्न होती है (बेरोजगारी अनुशासनात्मक उपकरण है)।
---
4. माइकल स्पेंस (Michael Spence) – 1973
परिचय: अमेरिकी अर्थशास्त्री, नोबेल पुरस्कार (2001 – एकर्लोफ, स्पेंस, स्टिग्लिट्ज के साथ)। नौकरी बाजार संकेत सिद्धांत (Job Market Signalling) के जनक।
सिद्धांत: नौकरी बाजार संकेत सिद्धांत (Job Market Signalling Model) – शिक्षा (education) एक उत्पादकता-बढ़ाने वाला निवेश (human capital) होने के बजाय एक संकेत (signal) है जो श्रमिकों की अंतर्निहित उत्पादकता (underlying productivity) को प्रकट (reveal) करता है।
पुस्तक / लेख: "Job Market Signaling" – Quarterly Journal of Economics (1973)।
वर्ष: 1973।
मुख्य मान्यताएँ (Assumptions):
1. श्रम बाजार में असममित जानकारी (asymmetric information) होती है: नियोक्ता (employer) श्रमिकों की वास्तविक उत्पादकता (true productivity) नहीं जानते – श्रमिक खुद जानते हैं।
2. श्रमिक दो प्रकार (types) के होते हैं: उच्च उत्पादकता (high-ability / high-productivity) और निम्न उत्पादकता (low-ability / low-productivity)।
3. शिक्षा (education) के दो प्रभाव हो सकते हैं:
· मानव पूंजी प्रभाव (Human capital effect): शिक्षा वास्तव में उत्पादकता बढ़ाती है।
· संकेत प्रभाव (Signalling effect): शिक्षा उत्पादकता नहीं बढ़ाती, लेकिन यह श्रमिक के प्रकार (type) के बारे में एक संकेत (signal) के रूप में कार्य करती है।
4. संकेत (signal) केवल तभी प्रभावी (effective) होता है जब उच्च-उत्पादकता श्रमिकों के लिए संकेत देने की लागत (cost of signalling) निम्न-उत्पादकता श्रमिकों की तुलना में कम हो।
5. नियोक्ता शिक्षा के स्तर (level of education) को देखकर श्रमिकों की उत्पादकता का अनुमान (infer) लगाते हैं – और उसी के अनुसार मजदूरी (wage) देते हैं।
6. श्रमिक तब तक संकेत (signal) देते रहेंगे जब तक कि संकेत देने का लाभ (higher wage) लागत (cost) से अधिक हो।
मुख्य निष्कर्ष (Conclusions):
1. स्पेंस के संकेत मॉडल (Spence's Signalling Model) की मुख्य विशेषताएँ:
· दो प्रकार के श्रमिक (Two types): उच्च-क्षमता (H) और निम्न-क्षमता (L)।
· संकेत (Signal): शिक्षा का स्तर (e) – जैसे वर्षों की संख्या (years of schooling) या डिग्री (degree)।
· संकेत देने की लागत (Cost of signalling): c_H(e) और c_L(e) , जहाँ c_H'(e) < c_L'(e) (उच्च-क्षमता श्रमिकों के लिए संकेत देना सस्ता है – अर्थात वे आसानी से शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं)।
· नियोक्ता का विश्वास (Employer's belief): एक निश्चित शिक्षा स्तर e^* से ऊपर, नियोक्ता मानते हैं कि श्रमिक उच्च-क्षमता (H) है; नीचे, निम्न-क्षमता (L)।
· पृथक्करण संतुलन (Separating equilibrium): उच्च-क्षमता श्रमिक e^* या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त करते हैं, निम्न-क्षमता श्रमिक e^* से कम शिक्षा प्राप्त करते हैं – और नियोक्ता इसके आधार पर अलग-अलग मजदूरी (w_H > w_L) देते हैं।
· पूलिंग संतुलन (Pooling equilibrium): सभी श्रमिक समान शिक्षा स्तर चुनते हैं, और नियोक्ता औसत उत्पादकता (average productivity) के अनुसार समान मजदूरी देते हैं।
2. शिक्षा का संकेत मूल्य (Signalling value of education): शिक्षा उत्पादकता नहीं बढ़ा सकती है, फिर भी इसका मूल्य हो सकता है – क्योंकि यह श्रमिक के प्रकार (type) के बारे में जानकारी प्रकट (reveal) करती है।
3. स्पेंस मॉडल बनाम मानव पूंजी मॉडल (Spence vs Human Capital – Becker):
पहलू (Aspect) मानव पूंजी मॉडल (Becker) संकेत मॉडल (Spence)
शिक्षा का प्रभाव उत्पादकता बढ़ाती है (वास्तविक) उत्पादकता नहीं बढ़ाती (केवल संकेत)
शिक्षा का मूल्य उत्पादकता वृद्धि से सूचना (information) प्रकट करने से
सामाजिक प्रतिफल (Social return) सकारात्मक (positive) शून्य (या नकारात्मक – अगर केवल पुनर्वितरण)
नीति निहितार्थ शिक्षा सब्सिडी (subsidy) उचित शिक्षा सब्सिडी न्यायोचित नहीं (यह केवल संकेत है)
4. मॉडल के निहितार्थ (Implications):
· यदि शिक्षा केवल एक संकेत (signal) है, तो शिक्षा पर सरकारी सब्सिडी (government subsidy) न्यायोचित (justified) नहीं हो सकती – क्योंकि यह उत्पादकता नहीं बढ़ाती, केवल श्रमिकों को पुनर्वितरित (redistribute) करती है।
· हालाँकि, संकेत (signalling) स्वयं एक सामाजिक लागत (social cost) हो सकती है – उच्च-क्षमता श्रमिक शिक्षा में "अत्यधिक निवेश" (over-invest) कर सकते हैं, केवल निम्न-क्षमता श्रमिकों से खुद को अलग करने के लिए।
· परीक्षाएँ (exams), डिग्रियाँ (degrees), प्रमाणपत्र (certificates) – ये सभी संकेत (signals) हैं।
5. पृथक्करण संतुलन (Separating equilibrium) के लिए शर्त (Condition):
\frac{w_H - w_L}{c_L(e^*)} < 1 < \frac{w_H - w_L}{c_H(e^*)}
अर्थात उच्च-क्षमता श्रमिकों के लिए संकेत देने का लाभ (w_H – w_L) उनकी लागत (c_H) से अधिक होना चाहिए, और निम्न-क्षमता श्रमिकों के लिए लाभ उनकी लागत (c_L) से कम होना चाहिए।
आगे बढ़ाने वाले:
· गैरी बेकर (Becker) – मानव पूंजी सिद्धांत: स्पेंस के संकेत मॉडल ने बेकर के मानव पूंजी मॉडल को चुनौती दी (लेकिन दोनों सह-अस्तित्व में हैं)।
· जोसेफ स्टिग्लिट्ज (Stiglitz): स्क्रीनिंग (screening) – नियोक्ता स्वयं संकेतों (जैसे परीक्षा) का उपयोग करके श्रमिकों को छाँट (screen) सकते हैं (स्पेंस के मॉडल में, श्रमिक स्वयं संकेत देते हैं – "सिग्नलिंग" बनाम "स्क्रीनिंग")।
· एंड्रयू वाइस (Weiss): शैक्षिक संकेत (educational signalling) पर अनुभवजन्य कार्य (empirical work)।
· रिले (Riley): संकेत मॉडल को सामान्यीकृत (generalised) किया।
आलोचना (Criticism):
· मानव पूंजी सिद्धांतकार (Human capital theorists – Becker, Mincer): स्पेंस शिक्षा के उत्पादकता-बढ़ाने वाले (productivity-enhancing) प्रभाव को कम करके आंकते हैं। अनुभवजन्य साक्ष्य (empirical evidence) बताते हैं कि शिक्षा वास्तव में उत्पादकता बढ़ाती है (जैसे Mincer earnings function) – संकेत केवल एक अतिरिक्त (additional) प्रभाव है, न कि एकमात्र (sole) प्रभाव।
· बहु-संकेत (Multiple signals) की उपेक्षा: वास्तविक जीवन में, नियोक्ता केवल शिक्षा को ही नहीं देखते – वे पिछले अनुभव (experience), साक्षात्कार (interviews), संदर्भ (references) आदि को भी देखते हैं। स्पेंस का मॉडल केवल एक संकेत (शिक्षा) पर केंद्रित है।
· क्या शिक्षा वास्तव में लागत (cost) है? स्पेंस मानते हैं कि शिक्षा "लागत" (effort, time, money) है – लेकिन शिक्षा का आनंद (enjoyment) भी तो लिया जा सकता है! यदि उच्च-क्षमता श्रमिक शिक्षा का आनंद लेते हैं, तो शिक्षा उनके लिए "नकारात्मक लागत" (negative cost) हो सकती है – जो मॉडल को तोड़ देती है।
· पृथक्करण (Separating) और पूलिंग (pooling) संतुलन में एकाधिक (multiple) संतुलन: मॉडल कई संतुलन (multiple equilibria) की अनुमति देता है – यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि कौन सा संतुलन घटित होगा (संतुलन चयन – equilibrium selection – की समस्या)।
· नीति निहितार्थ (Policy implications) विवादास्पद हैं: यदि शिक्षा केवल एक संकेत (signal) है, तो सरकार को शिक्षा सब्सिडी (education subsidy) बंद कर देनी चाहिए – यह एक अलोकप्रिय (unpopular) निष्कर्ष है। अधिकांश देश शिक्षा सब्सिडी देना जारी रखते हैं, यह मानते हुए कि शिक्षा का मानव पूंजी प्रभाव (human capital effect) प्रबल है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Points):
· PYQ (UGC-NET / राज्य सेवाएँ): "नौकरी बाजार संकेत सिद्धांत (Job Market Signalling Theory) किसने दिया?" → माइकल स्पेंस (Michael Spence, 1973)।
· PYQ: "स्पेंस के संकेत मॉडल (Signalling Model) के अनुसार, शिक्षा का मुख्य कार्य क्या है?" → श्रमिक की अंतर्निहित उत्पादकता (underlying productivity) के बारे में एक संकेत (signal) देना – उत्पादकता बढ़ाना नहीं।
· PYQ: "स्पेंस मॉडल और बेकर (मानव पूंजी) मॉडल में मुख्य अंतर क्या है?" → बेकर: शिक्षा उत्पादकता बढ़ाती है (मानव पूंजी); स्पेंस: शिक्षा उत्पादकता नहीं बढ़ाती, केवल संकेत देती है (signalling)।
· ट्रिक: "Spence = S for 'Signalling' – 'S' also for 'Separating equilibrium'"।
· महत्वपूर्ण शब्द: संकेत (Signalling), स्क्रीनिंग (Screening), असममित जानकारी (Asymmetric information), पृथक्करण संतुलन (Separating equilibrium), पूलिंग संतुलन (Pooling equilibrium), मानव पूंजी (Human capital), नौकरी बाजार (Job market), शिक्षा (Education)।
Numerical Question (Signalling Model):
प्रश्न: एक श्रम बाजार में दो प्रकार के श्रमिक हैं: H (उच्च उत्पादकता, उत्पादन मूल्य = ₹200 प्रति दिन) और L (निम्न उत्पादकता, मूल्य = ₹100 प्रति दिन)। जनसंख्या में 50% H और 50% L हैं। नियोक्ता उत्पादकता नहीं देख सकते, केवल शिक्षा (e) देख सकते हैं। शिक्षा प्राप्त करने की लागत H के लिए c_H(e) = 10e, L के लिए c_L(e) = 30e (e वर्षों में)। पृथक्करण संतुलन (separating equilibrium) के लिए e* का मान क्या होना चाहिए? (मान लें w_H = 200, w_L = 100)
हल:
1. पृथक्करण संतुलन में, H शिक्षा e* प्राप्त करता है, L शिक्षा 0 प्राप्त करता है।
2. H के लिए प्रोत्साहन संगतता (Incentive compatibility for H): H को शिक्षा प्राप्त करने से लाभ होना चाहिए:
200 - 10e^* \ge 100 - 0 \implies 200 - 10e^* \ge 100 \implies 100 \ge 10e^* \implies e^* \le 10
3. L के लिए प्रोत्साहन संगतता (Incentive compatibility for L): L को शिक्षा प्राप्त करने से बचना चाहिए:
100 - 0 \ge 200 - 30e^* \implies 100 \ge 200 - 30e^* \implies 30e^* \ge 100 \implies e^* \ge \frac{100}{30} \approx 3.33
4. संयोजन (Combining): 3.33 \le e^* \le 10 ।
5. एक सरल मान लें e^* = 5 वर्ष (उदाहरण के लिए) – यह दोनों शर्तों को संतुष्ट करता है।
6. उत्तर: e* किसी भी मान पर हो सकता है e^* \in [3.33, 10] – उदाहरणार्थ e* = 5 वर्ष।
MCQ:
Q: माइकल स्पेंस (Michael Spence) के नौकरी बाजार संकेत मॉडल (Job Market Signalling Model) के अनुसार, शिक्षा (education) का क्या कार्य है?
· (a) श्रमिक की उत्पादकता (productivity) को बढ़ाना
· (b) श्रमिक की अंतर्निहित उत्पादकता (underlying productivity) के बारे में एक संकेत (signal) देना
· (c) श्रमिकों के बीच असमानता (inequality) को कम करना
· (d) सरकारी राजस्व (government revenue) बढ़ाना
उत्तर: (b) श्रमिक की अंतर्निहित उत्पादकता (underlying productivity) के बारे में एक संकेत (signal) देना
One-Line Revision:
· Spence: नौकरी बाजार संकेत सिद्धांत (Job Market Signalling) – शिक्षा उत्पादकता नहीं बढ़ाती, बल्कि उच्च-क्षमता श्रमिकों का एक संकेत (signal) है (क्योंकि उनके लिए शिक्षा प्राप्त करना सस्ता है); पृथक्करण संतुलन (separating equilibrium) में, उच्च-क्षमता श्रमिक अधिक शिक्षा प्राप्त करते हैं और उच्च मजदूरी पाते हैं।
---
सभी 4 की तुलना सारणी (Quick Revision)
अर्थशास्त्री मुख्य योगदान प्रमुख अवधारणा फोकस (Focus) वर्ष
Doeringer & Piore Dual Labour Market Theory प्राथमिक (Primary) और द्वितीयक (Secondary) बाजार; सीमित गतिशीलता श्रम बाजार विभाजन (Segmentation), संस्थागत कारक 1971
Stiglitz & Yellen Efficiency Wage Theory दक्षता मजदूरी > प्रतिस्पर्धी मजदूरी; शिरकत (shirking), कारोबार (turnover), प्रतिकूल चयन (adverse selection) अनैच्छिक बेरोजगारी (Involuntary unemployment), श्रमिक अनुशासन (worker discipline) 1980s
Michael Spence Job Market Signalling शिक्षा एक संकेत (signal) है, उत्पादकता-बढ़ाने वाला निवेश नहीं असममित जानकारी (Asymmetric information), पृथक्करण संतुलन (Separating equilibrium) 1973
---
One-Line Revision (पूरी 4 की सूची – मेमोरी ट्रिक)
"Doeringer-Piore ने श्रम बाजार को दो भागों में बाँटा (प्राथमिक-द्वितीयक), Stiglitz-Yellen ने बताया कि फर्में प्रतिस्पर्धी मजदूरी से अधिक क्यों देती हैं (दक्षता मजदूरी, बेरोजगारी अनुशासन), और Spence ने बताया कि शिक्षा केवल एक संकेत (signal) है – उत्पादकता बढ़ाने वाला निवेश नहीं!"
---
क्या आप चाहेंगे कि मैं इन 4 अर्थशास्त्रियों पर MCQ, Assertion-Reason, Match the Following और Numerical MCQs का एक अतिरिक्त सेट दूं?
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें